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शक्ति को संजोकर रखने में ही शक्ति की आराधना की पूर्णता है

शक्ति को संजोकर रखने में ही शक्ति की आराधना की पूर्णता है - हरि चैतन्य पुरी हिमांशु मोदी कामवन -तीर्थराज विमल कुण्ड स्थित हरि कृपा आश्रम के संस्थापक एवं हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी हरि चैतन्य पुरी महाराज ने विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि असंतुलित, असंयमित, अनियमित दिनचर्या के कारण, गलत खान-पान के कारण,चरित्र हीनता के कारण या दुरूउपयोग के कारण हम सभी आज अपनी शक्ति को खोते चले जा रहे हैं।अपने दिव्य व ओजस्वी प्रवचनों में उन्होंने कहा कि शक्ति विहीन जीवन तो निरर्थक है। अतिशयोक्ति न होगी कि शक्ति विहीन तो शिव भी शव तुल्य है।शक्ति की अनादि काल से आराधना चल रही है।विभिन्न रूपों में सभी मतों, संप्रदायों में शक्ति की अराधना के महत्व को स्वीकार किया है। लेकिन शक्ति की सच्ची उपासना शक्ति को संजोकर रखने में है। नौ दिन के प्रतीक रूप में जो अपने शरीर के नौ द्वारों पर संयम व नियंत्रण रखता है उसे अवश्य ही विजय प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि हम सभी के अंदर सदैव से अच्छाई व बुराई,धर्म-अधर्म, उचित-अनुचित इत्यादि द्वंद चल रहा है। लेकिन यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम किसे जताते हैं। मन की चंचलता को अभ्यास द्वारा रोककर एकाग्रचित्त होकर, बर्हिमुखता त्यागकर, अंर्तमुख होकर हम अपनी स्वयं की प्रभा को जागृत कर सकते हैं। अध्यात्म पथ पर अग्रसर हो सकते हैं। प्रभु भक्ति का यदि हृदय में निवास हो तो किंचित मात्र भी प्रत्यक्ष में तो क्या स्वप्न में भी हमें दुख व्यथित नहीं कर सकते। किसी सुखी को देखकर ईषर्या करना, व दुखी को देखकर प्रसन्न होना यह दुष्टता के लक्षण है। आज हर ओर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। धर्म के अनुष्ठान चाहे बहुत हो रहे हैं। परंतु धर्म के आचरण में इतनी वृद्धि नहीं हो रही है। मदिरापान, मांसाहार, दूसरों के अनिष्ट चिंतन व अनिष्ट दिल दुखाना, जीवो की हत्या करना, वेद शास्त्रों के प्रतिकूल चलना, तीर्थ, मंदिर, मस्जिद, चर्च इत्यादि की मर्यादाओं को समाप्त करने का प्रयास, माता-पिता व बुजुर्ग संत महापुरुषों का अनादर व तिरस्कार करना, देश व समाज को तोड़ने की घृणित साज़िशे करना अथवा किसी प्रकार से भी उनमें सहयोग देना इत्यादि ये सभी आसुरी प्रवृत्तियां है। हम सभी स्वयं को इनसे दूर रहें साथ ही औरों को बचने की प्रेरणा दें। अपने दिव्य प्रवचनों में उन्होंने कहा कि प्रेम,एकता व सद्भाव को बढ़ावा दें। धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं परंतु दुर्भाग्यवश आज धर्म के नाम पर लोग टूटते व बटते जा रहे हैं। संत, महापुरुष व परमात्मा सबके हैं व सभी उनके हैं। इन्हें मात्र किसी वर्ग, संप्रदाय, जाति इत्यादि तक सीमित करना गलत होगा। विभिन्न मतभेदों को त्यागकर परिवार, देश व समाज में मिलजुल कर रहे। हम सभी अपने अन्तर मे आ चुके असुरत्व को त्यागे। किंचित मात्र भी अपने अंदर ना आने दें। तथा देवत्व को अपनाएं। पावन भारत देश व इस देवभूमि की संस्कृति, पवित्रता व मर्यादा को नष्ट ना होने दें। देवता और राक्षसों का युद्ध सतयुग इत्यादि में ही नहीं सदैव से हर प्राणी मात्र के अन्तर में होता है, हो रहा है, व होता रहेगा। हमारे अंतर में चलने वाले देवत्व व असुरत्व के द्वंद में जीव किसे विजयी कराता है यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। मात्र अपने अधिकारों के लिए ही जागरूक ना हो, अपने कर्तव्यों का भी पालन करें व सेवा करें। सद्गुरु के कहे अनुसार चलें। उन्होंने कहा कि धर्म के उत्थान व अधर्म के विनाश के लिए यथासामर्थ्य, यथासंभव योगदान भी अवश्य दें। शबरी, निषाद इत्यादि जैसे समाज में ठुकराए व उपेक्षित वर्ग को भी गले लगाएं तभी राम के सच्चे भक्त कहलाने के अधिकारी हो पाएंगे। सभी में परमात्मा के दर्शन करते हुए व्यवहार करो।जो समस्त संसार को प्रभुमय कहते हैं या देखते हैं तो वे विरोध किससे करते हैं। वैर- विरोध, घृणा, द्वेष, अशांति इत्यादि त्यागो। कर्म, भक्ति व ज्ञान का जीवन में समन्वय स्थापित करो।

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